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कुम्भ श्याम और मीराबाई मंदिर, चित्तौड़गढ़ के लिए एक स्थान है जहां प्रेम और भक्ति का संगम होता है। परम्परा के अनुसार, मीराबाई की जन्मस्थान है और इस स्थान का संबंध उनके जीवन से है। स्थानीय विश्वास के अनुसार, मीराबाई ने राजकुमारी के जीवन से विदा ले ली और कृष्ण की पूजा में अपना जीवन निछावर कर दिया। कुम्भ श्याम मंदिर की स्थापना १४४८ ई. में राणा कुम्भा ने की थी और इसका नाम वराह के नाम पर रखा गया था। स्थानीय परम्परा के अनुसार, वराह कृष्ण के तीसरे अवतार हैं।
कुंभा श्याम और मीराबाई मंदिर चित्तौड़गढ़ के पवित्र स्थल हैं, जो राजस्थान के साम्राज्य के विपरीत हैं। यहां पवित्र प्रेम का स्थान है, जो आपके चित्तौड़गढ़ यात्रा पैकेज को पूरा करता है। कुंभा श्याम मंदिर, 1448 में राना कुंभा ने बनाया था और वाराह को समर्पित किया था। मंदिर की विशेषता पिरामिड-जैसा सीला है, जो इसके से अन्य मंदिरों से अलग करता है।
कुम्भ श्याम और मीरा मंदिरों की यात्रा में सबसे अच्छा समय दोपहर के दिन है, जब सूरज की रोशनी मंदिरों की सुंदरता को और अधिक सुनिश्चित करती है। मंदिरों के पास एक साधारण प्रवेश द्वार है, जिसके पास एक साधारण प्रवेश द्वार है। सादे कपड़े और कोम्फर्टेबल जूते पहनने की सलाह दी जाती है, क्योंकि मंदिरों की सड़कें काफी चटपटी हैं। मंदिरों को सीधे चित्तौड़गढ़ से मिल जाते हैं, और स्थानीय लोगों से पूछने की सलाह दी जाती है कि क्या कीमतें और समय हैं, क्योंकि ये बदल सकते हैं।
कुम्भ श्याम मंदिर और मीराबाई मंदिर, चित्तौडगढ़ के लिए साधारण रूप से पूजा और प्रथा है कि साधारण लोगों के लिए प्रार्थना के लिए आते हैं, मीराबाई की पूजा में शामिल होते हैं, जिसका संबंध कृष्ण के साथ है। मंदिर की स्थापना 1448 में राना कुम्भ श्याम ने की थी, जिसका नामकरण वराह के नाम पर किया गया है, जो हिंदू धर्म के तीसरे अवतार हैं। मंदिर की स्थापत्य शैली इंदो-आर्यन है, जिसमें पिरामिड जैसा स्तम्भ है, जो इसे अन्य मंदिरों से अलग करता है।